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फोर्ब्स की सूची में कुल 32 अरब डॉलर की हैसियत के साथ मुकेश अंबानी सबसे धनी भारतीय बन गए हैं। फोर्ब्स पत्रिका द्वारा जारी वार्षिक धनी लोगों की सूची में मुकेश अंबानी स्टील निर्माता लक्ष्मी मित्तल और अपने छोटे भाई अनिल अंबानी से काफी आगे हैं. सूची में 30 अरब डॉलर के साथ लक्ष्मी मित्तल दूसरे नंबर पर जबकि 17.5 अरब डॉलर के साथ अनिल अंबानी तीसरे पायदान पर हैं. रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष मुकेश अंबानी ने कि मुंबई में टैक्सी के परमिट के लिए मराठी की अनिवार्य संबंधी विवाद को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा है कि मुंबई महानगर पूरे भारत का है.
उन्होंने लंदन स्कूल आफ इकानामिक्स में राज्य सभा सदस्य एन के सिंह की किताब ‘नाट बाई रीजन एलोन: पालिटिक्स आफ चेंज’ पर परिचर्चा के दौरान कहा ‘‘हम पहले भारतीय हैं. मुंबई, चेन्नई और दिल्ली हर भारतीय के हैं. यही वास्तविकता है.’’ अंबानी ने कहा कि भारत की कंपनियां जहां औद्योगिक उदारीकरण के बाद लाईसेंस राज के चंगुल से निकल चुकी हैं वहीं मुंबई के गरीब टैक्सी वाले अभी भी लाईसेंस राज के शिकंजे से मुक्त नहीं हुए हैं.
टैक्सी ड्राईवर विवाद के संबंध में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में अंबानी ने कहा कि वास्तविक चुनौती यह है कि भारत हर साल 1. 5 करोड़ से दो करोड़ नए रोजगार पैदा कर सकता है या नहीं.
ऐसी कई सेलेब्रिटी जोडि़यां रही हैं जो परवान नहीं चढ़ सकीं. इसका ताजा उदाहरण भारतीय टेनिस सनसनी सानिया मिर्जा हैं जिनकी सोहराब मिर्जा के साथ हुई सगाई टूट चुकी है. सानिया ने लंबे समय के अपने साथी को जीवन साथी बनाने का फैसला पिछले वर्ष किया था. सानिया ने कहा 'मंगनी के बाद से हमें लगा कि हम एक-दूसरे के लिए नहीं बने हैं. अलग हुए एंजलीना और ब्रैड पिट् सोहराब से सानिया की सगाई टूट गई सानिया मिर्जा की सगाई टूटी | सानिया की सोहराब से जुलाई 2009 में हुई थी सगाई सोहराब नहीं बन सके सानिया के हमसफ
महंगाई ने अब तक किस हद को पार नही किया पहले आटा, चावल, दाल, सब्जिया, फल यह सब तो महंगा हुआ ही साथ ही बिजली के दामो में बढ़त हो गई और अब तो पानी के दामो को भी बढ़ाया जा रहा है अगले साल से इन सब के दाम तो बढ़ा दिए सरकार ने लेकिन आमदनी का क्या वो कब बढ़ेगी? ऐसे ही चलता रहा तो महंगाई के चलते बुख के साथ साथ प्यासा भी रहने की आदत डालनी पड़ेगी!
ज्यादातर राज ठाकरे के ब्यान से सुनने को मिलता है महाराष्ट्र मराठो का है और मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी है।
लेकिन सविधान के तहत तो हर भारतीय नागरिक को पूरे भारत में कही भी रहने और कारोबार करने का पूर्णतया अधिकार है, तो फिर महाराष्ट्र को सिर्फ़ मराठो का बोलना कहा तक उचित है?
मुंबई हो या महाराष्ट्र है तो भारत का ही, तो महाराष्ट्र को मराठो का कहना भारत के हर नागरिक को महाराष्ट्र से अलग कहना और मराठो को भारतीय से अलग कहना है, और न तो इसमे किसी भी मराठो की गलती है और न ही महाराष्ट्र में रहने वाले भारतीयों की, क्योकि वह भी अपने आप को भारतीय समझते है।
दिल्ली में किसी को भी सुरक्षित कह पाना आसान नही था लेकिन मेट्रो रेल ने एक उम्मीद दिल्लीवासियों की दिल में पैदा की जिस पर वो भी खरी उतर नही पाई। अब तक तो ट्रैक और पिल्लर वाले हादसे सुनने और देखने को आ रहे थे लेकिन अब तो मेट्रो रेल का ट्रैक पर से उतर जाना यह सब देखने को आ रहा है। वैसे इसमे गलती है भी किसकी आज जहा मेट्रो के पिल्लर का निर्माण किया जा रहा है वही जाकर देखा जाए कि पहले वाले पिल्लर और अब के पिल्लर की बनावट दोनों में कितना अन्तर है
पिछले दिनों इस बात से पूरे समाज में सनसनी फैल गई कि अब लड़के-लड़कियाँ लो वेस्ट जीन्स नहीं पहन सकेंगे। मुद्दआ ये है कि इस प्रकार के परिधानों को उत्तोजक बताते हुए इन पर बैन लगा दिया गया है। अब ये विषय विश्वविद्यालयों की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं से लेकरसाहित्यिक पत्रिकाओं के वाद-विवाद व्यवसाय तक छाया रहेगा।
दरअसल हमारा जागरूक समाज इस निर्णय को इसलिए स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि यह हमारे मौलिक अधिकार 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का हनन है। इस संदर्भ में परम आदरणीया मल्लिका जी की एक सूक्ति उध्दृत की जा सकती है। जब उनके परिधानों को लेकर कुछ संकुचित मानसिकता वाले लोगों ने हंगामा खड़ा किया था तो मल्लिका जी ने यह उद्बोधन देकर मुआमला शांत किया था कि मेरे पास ख़ूबसूरत बदन है तो मैं क्यों न दिखाऊँ। तर्क में दम था। सो हंगामाजीवियों को साँप सूंघ गया और संपादकीय पृष्ठों से उठा विवाद पेज थ्री के इस बयान से समाप्त हो गया।
कदाचित् बुध्दिजीवियों ने यह सोचकर विवाद को आगे नहीं बढ़ाया कि यदि कल को मल्लिका जी ने उन्हें कम कपड़े पहनने की चुनौती दे डाली तो क्या होगा! सो अपनी इज्ज़त अपने हाथ....। ख़ैर कपड़ों की तरह विषय भी भटक गया था। सो वापस लो वेस्ट जीन्स पर आते हैं।
यह मुआमला केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का नहीं है अपितु हमारे सभ्य समाज की 'अनुभूति की स्वतंत्रता' का भी है। जब कुछ 'सुराग़' ही नहीं दिखाई देगा तो कल्पनाशील समाज पूरी तस्वीर की कल्पना कैसे करेगा। और जब तस्वीर की कल्पना ही नहीं होगी तो वह सुखद अनुभूति कैसे होगी जो..........!
इतना ही नहीं, ये निर्णय पुन: हमारे समाज की महिलाओं को उसी पुरुषवादी कठघरे में ला खड़ा करने का एक षडयंत्र है जिससे बाहर आने के लिए सैंकड़ों लोग महिला-मुक्ति का झंडा उठाए कमा रहे हैं। पहले पुरुषों ने धर्म के नाम पर महिलाओं को घर की चाहरदीवारी में क़ैद कर रखा था और अब पूरे कपड़ों में क़ैद करने के लिए समाज और सभ्यता की दुहाई दी जा रही है।
ये अन्याय नहीं चलेगा। और चूंकि क्रांति दबाने से और भड़कती है इसलिए यदि पुरुष यूँ ही मनमानी करते रहे और महिलाओं को पूरे कपड़े पहनाने को विवश किया गया तो महिलाएँ इसका और भी अधिक विरोध करेंगी और कोई कॉरपोरेट कंपनी अपनी सोशल रिस्पांसिबिलिटी निभाते हुए लो थाइज़ जीन्स लांच कर देगी। फिर देखते रह जाएंगे सारे पुरुष!
सरकार को चाहिए कि ऐसे मामलों को गंभीरता से लेते हुए इस निर्णय पर बैन लगाए। ज़रा सोचिए! एक ग़रीब आदमी जो अभी दो सप्ताह पहले लिवाइज़ की जीन्स ख़रीद कर लाया है, इस निर्णय के लागू होने से उसके दिल पर क्या बीतेगी। कहाँ से लाएगा नई जीन्स ख़रीदने के लिए वह पैसा। जिस दौर में लोगों के पास दाल-रोटी के लाले हैं, ऐसे में सरकार ने यदि इस प्रकार के निर्णयों पर रोक नहीं लगाई तो ग़रीबी कितनी बढ़ जाएगी।
वैसे भी जब गांधी जी अपने देशवासियों की चिंता में अपने पायजामे को धोती में बदल सकते हैं, तो गांधी जी के अनुयायी अपनी जीन्स को थोड़ा छोटा नहीं कर सकते। ये और बात है कि गांधी जी ने पाऊँचे काटे थे और हमने बैल्ट! पर मूल मुद्दआ तो कटौती का है। और कटौती हम कर रहे हैं। अब इस निर्णय पर पुनर्विचार होना चाहिए और इसको जीन्स से हटाकर टॉप पर लागू करना चाहिए कि जो लो वेस्ट टॉप पहनेगा उस पर ज़ुर्माना किया जाएगा। इससे हमारे टॉप भी ऊपर उठेंगे और 'संस्कृति' भी!
अपनों ने लूटा,गैरों में कहाँ दम था.मेरी हड्डी वहाँ टूटी,जहाँ हॉस्पिटल बन्द था.मुझे जिस एम्बुलेन्स में डाला,उसका पेट्रोल ख़त्म था.मुझे रिक्शे में इसलिए बैठाया,क्योंकि उसका किराया कम था.मुझे डॉक्टरों ने उठाया,नर्सों में कहाँ दम था.मुझे जिस बेड पर लेटाया,उसके नीचे बम था.मुझे तो बम से उड़ाया,गोली में कहाँ दम था.और मुझे सड़क में दफनाया,क्योंकि कब्रिस्तान में फंक्शन थ
ऑस्ट्रेलिया में हुए भारतीये छात्रों पर नस्लीय हमले में अब तक ऑस्ट्रेलिया में कोई कदम नही उठाया गया।
न तो उनका विरोध करने दिया जाता है और न ही उन हमलो के आरोपियों पर कार्यवाही की गई।
ऐसे में तो भारत के छात्रों का ऑस्ट्रेलिया में रहना किसी खतरे से कम नही जहा उसे सुरक्षा और अधिकारों से वंचित रखा जाता है।
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