इस चिट्ठे पर प्रकाशित सभी विचारों के लिये लेखक स्वयं उत्तरदायी है। संपादन मंडल का लेखक की राय से सहमत होना अनिवार्य नहीं है। -संपादक
दिल्ली में किसी को भी सुरक्षित कह पाना आसान नही था लेकिन मेट्रो रेल ने एक उम्मीद दिल्लीवासियों की दिल में पैदा की जिस पर वो भी खरी उतर नही पाई।
अब तक तो ट्रैक और पिल्लर वाले हादसे सुनने और देखने को आ रहे थे लेकिन अब तो मेट्रो रेल का ट्रैक पर से उतर जाना यह सब देखने को आ रहा है।
वैसे इसमे गलती है भी किसकी आज जहा मेट्रो के पिल्लर का निर्माण किया जा रहा है वही जाकर देखा जाए कि पहले वाले पिल्लर और अब के पिल्लर की बनावट दोनों में कितना अन्तर है

लो वेस्ट जीन्स पर बैन

पिछले दिनों इस बात से पूरे समाज में सनसनी फैल गई कि अब लड़के-लड़कियाँ लो वेस्ट जीन्स नहीं पहन सकेंगे। मुद्दआ ये है कि इस प्रकार के परिधानों को उत्तोजक बताते हुए इन पर बैन लगा दिया गया है। अब ये विषय विश्वविद्यालयों की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं के वाद-विवाद व्यवसाय तक छाया रहेगा।

दरअसल हमारा जागरूक समाज इस निर्णय को इसलिए स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि यह हमारे मौलिक अधिकार 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का हनन है। इस संदर्भ में परम आदरणीया मल्लिका जी की एक सूक्ति उध्दृत की जा सकती है। जब उनके परिधानों को लेकर कुछ संकुचित मानसिकता वाले लोगों ने हंगामा खड़ा किया था तो मल्लिका जी ने यह उद्बोधन देकर मुआमला शांत किया था कि मेरे पास ख़ूबसूरत बदन है तो मैं क्यों न दिखाऊँ। तर्क में दम था। सो हंगामाजीवियों को साँप सूंघ गया और संपादकीय पृष्ठों से उठा विवाद पेज थ्री के इस बयान से समाप्त हो गया।

कदाचित् बुध्दिजीवियों ने यह सोचकर विवाद को आगे नहीं बढ़ाया कि यदि कल को मल्लिका जी ने उन्हें कम कपड़े पहनने की चुनौती दे डाली तो क्या होगा! सो अपनी इज्ज़त अपने हाथ....। ख़ैर कपड़ों की तरह विषय भी भटक गया था। सो वापस लो वेस्ट जीन्स पर आते हैं।

यह मुआमला केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का नहीं है अपितु हमारे सभ्य समाज की 'अनुभूति की स्वतंत्रता' का भी है। जब कुछ 'सुराग़' ही नहीं दिखाई देगा तो कल्पनाशील समाज पूरी तस्वीर की कल्पना कैसे करेगा। और जब तस्वीर की कल्पना ही नहीं होगी तो वह सुखद अनुभूति कैसे होगी जो..........!

इतना ही नहीं, ये निर्णय पुन: हमारे समाज की महिलाओं को उसी पुरुषवादी कठघरे में ला खड़ा करने का एक षडयंत्र है जिससे बाहर आने के लिए सैंकड़ों लोग महिला-मुक्ति का झंडा उठाए कमा रहे हैं। पहले पुरुषों ने धर्म के नाम पर महिलाओं को घर की चाहरदीवारी में क़ैद कर रखा था और अब पूरे कपड़ों में क़ैद करने के लिए समाज और सभ्यता की दुहाई दी जा रही है।

ये अन्याय नहीं चलेगा। और चूंकि क्रांति दबाने से और भड़कती है इसलिए यदि पुरुष यूँ ही मनमानी करते रहे और महिलाओं को पूरे कपड़े पहनाने को विवश किया गया तो महिलाएँ इसका और भी अधिक विरोध करेंगी और कोई कॉरपोरेट कंपनी अपनी सोशल रिस्पांसिबिलिटी निभाते हुए लो थाइज़ जीन्स लांच कर देगी। फिर देखते रह जाएंगे सारे पुरुष!

सरकार को चाहिए कि ऐसे मामलों को गंभीरता से लेते हुए इस निर्णय पर बैन लगाए। ज़रा सोचिए! एक ग़रीब आदमी जो अभी दो सप्ताह पहले लिवाइज़ की जीन्स ख़रीद कर लाया है, इस निर्णय के लागू होने से उसके दिल पर क्या बीतेगी। कहाँ से लाएगा नई जीन्स ख़रीदने के लिए वह पैसा। जिस दौर में लोगों के पास दाल-रोटी के लाले हैं, ऐसे में सरकार ने यदि इस प्रकार के निर्णयों पर रोक नहीं लगाई तो ग़रीबी कितनी बढ़ जाएगी।

वैसे भी जब गांधी जी अपने देशवासियों की चिंता में अपने पायजामे को धोती में बदल सकते हैं, तो गांधी जी के अनुयायी अपनी जीन्स को थोड़ा छोटा नहीं कर सकते। ये और बात है कि गांधी जी ने पाऊँचे काटे थे और हमने बैल्ट! पर मूल मुद्दआ तो कटौती का है। और कटौती हम कर रहे हैं। अब इस निर्णय पर पुनर्विचार होना चाहिए और इसको जीन्स से हटाकर टॉप पर लागू करना चाहिए कि जो लो वेस्ट टॉप पहनेगा उस पर ज़ुर्माना किया जाएगा। इससे हमारे टॉप भी ऊपर उठेंगे और 'संस्कृति' भी!

हसी की चोट




अपनों ने लूटा,गैरों में कहाँ दम था.मेरी हड्डी वहाँ टूटी,जहाँ हॉस्पिटल बन्द था.मुझे जिस एम्बुलेन्स में डाला,उसका पेट्रोल ख़त्म था.मुझे रिक्शे में इसलिए बैठाया,क्योंकि उसका किराया कम था.मुझे डॉक्टरों ने उठाया,नर्सों में कहाँ दम था.मुझे जिस बेड पर लेटाया,उसके नीचे बम था.मुझे तो बम से उड़ाया,गोली में कहाँ दम था.और मुझे सड़क में दफनाया,क्योंकि कब्रिस्तान में फंक्शन थ

ऑस्ट्रेलिया में हुए भारतीये छात्रों पर नस्लीय हमले में अब तक ऑस्ट्रेलिया में कोई कदम नही उठाया गया।

न तो उनका विरोध करने दिया जाता है और न ही उन हमलो के आरोपियों पर कार्यवाही की गई।

ऐसे में तो भारत के छात्रों का ऑस्ट्रेलिया में रहना किसी खतरे से कम नही जहा उसे सुरक्षा और अधिकारों से वंचित रखा जाता है।

भारत में स्वाइन फ्लू के अब तक १९ मामले सामने आ चुके है
और यह सब न्यू यार्क अथवा दुसरे देशो से आए यात्रियों से पनपा है।
यह सब बिना जांच के भारत में आने वाले यात्रियों से फैला है और
इसका जिम्मेदार और कोई नही एयरपोर्ट में जांच में होने वाली ढील है,
जिसकी कीमत भारतीयों को चुकानी पढ़ रही है।

रोड रेज से गोलाबारी तक

गुड़गांव के सोहना में जो रोड रेज की घटना हुई, जिसका परिणाम गोलीबारी तक पहुँच गया।
घटना सफारी और फोर्ड फिएस्टा में टक्कर की है, घटना है तो साधारण लेकिन इसके परिणाम से कोई घायल हुआ तो किसी को अपनी जान से हाथ धोने पढ़े।

फोर्ड फिएस्टा में बैठे ३ लड़कों ने जिस तरह डंडों और गोलियां प्रयोग करके मारपीट करी है उनके इस बर्ताव से साफ़ जाहिर होता है कि या तो वह ड्रिंक या फिर अपनी अमीरी की शान में आकर यह सब किया है।
आख़िर उन लड़कों के पास पिस्टल कहाँ से आई, और क्या उन्हें क्या जरुरत पड़ी कि वह अपने पास पिस्टल रखे।

इन सब का जिम्मेदार और कोई नही बल्कि उनके ख़ुद माँ-बाप है जो अपने बच्चों को पैसे कि इतनी छूट दे देते है कि उनको ग़लत रास्ते में धकेल ने वाले वो ख़ुद होते है।

वरुण का नामांकन पत्र

पीलीभीत से कथित सांप्रदायिक भाषण देने वाले वरुण गाँधी १५ दिनों के लिए जेल से तो छूट गए
लेकिन अब वो भाजपा में नामांकन के लिए पत्र भरेगे।

क्या देश की सरकार के लिए ऐसे उम्मीदवारों का खड़ा होना कहा तक सही है,
जो चुनाव से पहेले ही सांप्रदायिक भाषण दे रहे है वो जीतने के बाद क्या रंग दिखाएगे।
अब से अपना गुस्सा प्रकट करने का नया तरीका
सामने वाले को जूता उठा कर मारो गुस्सा भी उतर गया और नाम भी रोशन हुआ
हमारे सभी नेता बे-कार

देश में नए कर्जदार

देश में नए कर्जदार पैदा हो रहे है वे जो नैनो खरीदने के लिए कर्ज ले रहे है और वे लाचार जो सिर्फ़ इसलिए कर्ज ले रहे है कि बच्चो की बड़ी फीस जमा कर सके

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